हँसने में बेवकूफ समझे जाने का डर है
रोने में जज्बाती समझे जाने का डर है,
लोगों से मिलने में नाते जुड़ जाने का डर है...
अपनी भावनाएं प्रकट करने में,
मन कि सच्ची बात खुल जाने का डर है..
अपने विचार, अपने सपने प्रकट करने में,
उनके चुरा लिए जाने का डर हैं....
किसी को प्रेम ना करने पर, बदले में प्रेम ना मिलने का डर हैं...
जीने में मरने का डर हैं .....
आशा में निराशा का डर हैं .....
कोशिश करने में असफ़लता का डर हैं...
लेकिन ख़तरे उठाने जरुर जाने चाहिये, क्योंकि
जिन्दगी में ख़तरे ना उठाना ही सबसे बड़ा खतरा हैं
जो शक्श ख़तरे नही उठाता, वह ना तो कुछ करता हैं...
ना कुछ पाता हैं , और ना ही कुछ बनता हैं....
वे जिन्दगी के दुःख -दर्द से तो बच सकते हैं ,
लेकिन वे सीखने,महसूस करने ,बदलाव लाने,
आगे बढ़ने या प्रेम करने, और जीवन जीने को सिख नही पाते हैं ...
वे अपने नजरिये की जंजीर में बंधकर गुलाम बन जाते हैं , और अपनी आजादी खो देते हैं...
सिर्फ ख़तरे उठाने वाला इन्सान ही सही मायनो में आजाद हैं
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Arz hai ...
@ 2008-02-06 – 10:06:59
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